भारत
का अमृत भाल!
हिमगिरि जिसका मुकुट संवारे, सागर धोए चरण-कमल,
ऋषियों की पावन तप-स्थली, वीरों का यह वक्ष
अटल।
गंगा-यमुना की अविरल धारा
सी बहती है नव-चेतना,
यह भारत भूमि
हमारी है, गौरव की अमर उद्भावना।
रण में जब
हुंकार भरी थी, कांप उठी थी दसों दिशा,
राणा, शिवा और बिस्मिल ने
हर ली थी हर
दंभी निशा।
रक्त बहाकर सींचा जिसने इस माटी का
कण-कण,
वज्र-कठोर भुजाओं से जो मोड़
सके तूफ़ान-गगन।
यहाँ सिंह के जबड़ों से
भी दाँत को गिने जाते
थे कभी,
शौर्य देख अरि-दल का थर-थर कंपित होते
भाल सभी।
पर आज तनिक
दर्पण देखो, यह कैसा विचित्र
उल्लास हुआ?
इतिहास टटोलें सोने का, पर कर्मों में
आलस का कैसा वास
हुआ!
जो ज्ञान लुटाते
थे जग में, वे
आज डिग्री पर मौन खड़े,
खोखली वाहवाही की ख़ातिर आपस
में ही यह व्यर्थ
लड़े।
शेरों के इस उपवन
में अब गीदड़ राग
सुनाते हैं,
मातृभूमि की सेवा तजकर,
स्वार्थ की कुर्सी पर
इतराते हैं।
भाषण में सब चंद्रगुप्त हैं,
संसद में चाणक्य बने,
किंतु हकीकत की सड़कों देखो,
कैसे झूठे स्वप्न बुने।
जागो! अब केवल अतीत
के गुण गाने से बात न
बनेगी,
काग़ज़ की कश्ती से
सागर की लहरें कभी
न टलेंगी।
उठो भगीरथ बन फिर से,
तप का नव इतिहास
रचो,
वीर धर्म को धारण कर,
संकीर्ण स्वार्थ से ज़रा बचो।
वही बनेगा विश्वगुरु जो कर्मठ, सत्य
और अडिग रहता है,
जो देशहित में
अपनी हर एक सांस
को समर्पित कहता है।
गूंजेगा फिर जय-जयकार, टूटेगा
हर पाखंड का जाल,
उठेगा जब पुरुषार्थ खरा,
दमकेगा भारत का अमृत भाल!
दमकेगा भारत का अमृत भाल!
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