Thursday, September 17, 2026

भारत का नव-सूर्य ढला

 हिम-किरीट धारे नभ छूता, जगमग जिसका भाल प्रखर,

चरण पखारत सिंधु निरंतर, वंदित जिसका रूप अमर।

ऋषि-मुनियों की तपोभूमि यह, वेदों का पावन विस्तार,

कर्म-योग का शंख फूँकती, गंगा की अविरल जल-धार।

शून्य दिया जिस प्रज्ञा-बल ने, अगणित तारों को नाप लिया,

तक्षशिला-नालंदा की रज ने, तिमिर-दंश को व्याप लिया।

उपनिषदों का सत्य पुरातन, विज्ञान बन जग में मुस्काया,

अणु-परमाणु के स्पंदन में, ब्रह्म-नाद का रूप दिखाया।

अहिंसा की कोमल शय्या पर, सत्य-साधना का संबल,

बुद्ध-महावीर की करुणा से, खिला आत्म-बोध का शतदल।

पर जब-जब मर्यादा टूटी, तब गांडीव टंकार उठा,

अधर्म के वक्ष को चीरने को, गीता का नव-सार उठा।

प्रण-प्रतिज्ञा के धनी यहाँ पर, राणा-शिवा के बाहू तने,

आज़ादी की बलिवेदी पर, हँसकर लाखों वीर मरे।

रक्त बहाकर जो माटी को, सिंदूरी पहचान दिए,

मृत्यु को वंदन कर वीरों ने, जीवन के वरदान दिए।

अनेकता के सुरभित वन में, एकाकार सनातन प्राण,

भाषा, वेष, विभेद मिटाकर, गूंजे एकात्मिक गान।

पत्थर में जो प्राण प्रतिष्ठा, माटी को जो माँ बतलाए,

यह केवल भूखंड नहीं है, चेतना का जो दीप जलाए।

काल-चक्र के झंझावातों में, जिसकी लौ अविचल चमकी,

रोम-मिस्र सब धूल बने पर, हस्ती इस उपवन की न थमी।

अमृत-घट उर में संजोए, तम से ज्योति की ओर चला,

विश्व-शांति की पावन वेदी पर, भारत का नव-सूर्य ढला!

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