शून्य का षड्यंत्र (ऑर्गेनिक मोक्ष और साइबर चक्रव्यूह)
भाग १: स्क्रीन की गुलामी और 'शून्य' का बुलावा
सुधीर जी का जीवन चौबीस घंटे नोटिफिकेशन की घंटी पर नाचता था। सुबह आँख खुलते ही कलाई पर बंधी स्मार्ट-वॉच उन्हें 'खराब नींद' का ताना देती, और दिन भर लैपटॉप पर एक्सेल शीट्स, स्लैक पिंग्स और 'इमरजेंट कॉल्स' उनकी आत्मा का निचोड़ निकाल लेते थे। शहर के इस डिजिटल कोलाहल से पस्त होकर, जब उनके सहकर्मी चिन्मय ने उन्हें हिमालय की वादियों में स्थित ‘शून्य: द इनर स्पेस’ के बारे में बताया, तो सुधीर जी को लगा कि यही उनके जीवन का अंतिम तिनका है।
दावा था—तीन दिन का पूर्ण मौन, कोई तकनीक नहीं, फोन जमा, सिर्फ सादगी, हर्बल सूप और अंतरात्मा की खोज। फीस: तिरपन हज़ार रुपये प्लस जीएसटी।
सुधीर जी ने बिना सोचे क्रेडिट कार्ड स्वाइप किया और शुक्रवार की दोपहर उस एकांत पहाड़ी रिसॉर्ट में पहुँच गए।
देवदार के घने जंगलों के बीच बने उस आलीशान, लकड़ी के महलनुमा आश्रम के मुख्य द्वार पर लिखा था: “यहाँ अहंकार और तकनीक दोनों वर्जित हैं।”
स्वागत कक्ष में उन्हें मिले ‘आचार्य बोधानंद’—मलमल का सफेद चोगा, गले में नक्काशीदार रुद्राक्ष, आँखों में रहस्यमयी शांति और चेहरे पर ऐसी मुस्कान मानो वे सीधे स्वर्ग से डेलिगेशन लेकर आए हों।
“सुधीर जी, इस पीतल की टोकरी में अपने फोन, स्मार्ट-वॉच और लैपटॉप को विसर्जित कर दीजिए। बाहर की दुनिया का संपर्क टूटेगा, तभी भीतर का नेटवर्क जुड़ेगा,” आचार्य जी की आवाज़ इतनी मखमली थी कि सुधीर जी ने बिना हिचकिचाए अपना फोन और कंपनी का लैपटॉप टोकरी में डाल दिया।
वहाँ अन्य मेहमान भी थे:
रोहन मल्होत्रा: फिनटेक यूनिकॉर्न का वीपी, जिसके फोन में करोड़ों के क्रिप्टो वॉलेट और नए पेमेंट गेटवे का सोर्स कोड था।
शिखा कपूर: लाखों फॉलोअर्स वाली लाइफस्टाइल इन्फ्लुएंसर।
वर्मा जी: रक्षा मंत्रालय से रिटायर हुए कड़क, पुराने मिजाज के पूर्व उप-सचिव।
और तीन बड़े कॉरपोरेट एग्जीक्यूटिव्स।
शाम सात बजे सबको एक गोलाकार ध्यान-कक्ष में बिठाकर अड़तालीस घंटे के ‘आर्य मौन’ का संकल्प दिलाया गया।
भाग २: पहली दरार—अजीब संकेत
पहले चौबीस घंटे तो सब कुछ वैसा ही चला जैसा विज्ञापनों में दिखाया जाता है। उबला हुआ बेस्वाद सूप, लेमनग्रास की अगरबत्तियाँ, और शून्य में घूरते हुए लोग।
मगर शनिवार की दोपहर सुधीर जी को पहली बार कुछ खटका।
वे ध्यान-कक्ष से निकलकर हाथ धोने गए थे। गलियारे के अंत में, जहाँ ‘स्टाफ ओनली’ का बोर्ड टंगा था, उन्होंने एक गेरुआ वस्त्रधारी साधु को देखा। उस ‘साधु’ के कान में आधुनिक वायरलेस इन-ईयर ईयरपीस लगा था और वह धीमी आवाज़ में अंग्रेजी में कह रहा था: “सर्वर रूम का बैकअप तैयार रखो। रात बारह बजे का मौसम सबसे मुफीद है। कोई सस्पेक्ट नहीं करेगा।”
सुधीर जी ठिठक गए। साधु और सर्वर रूम?
तभी उस साधु ने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में कोई आध्यात्मिक करुणा नहीं थी, बल्कि एक ट्रेंड बाउंसर जैसी तीखी सतर्कता थी। सुधीर जी ने तुरंत नज़रें झुकाईं और अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। उनके सीने में एक अनजानी धड़कन तेज हो गई थी।
दोपहर तीन बजे सुधीर जी खिड़की के पास खड़े थे। उन्होंने देखा कि आश्रम के चारों ओर कंटीले तारों की बाड़ थी, जिसे बाहर से देखने पर साधारण बांस की बाड़ का रूप दिया गया था। और जो दो सुरक्षा गार्ड माली बनकर पौधों को पानी दे रहे थे, उनकी जैकेट के नीचे उभरे हुए सांचे किसी पिस्तौल के होलस्टर जैसे लग रहे थे।
‘क्या मैं ज़रूरत से ज़्यादा सोच रहा हूँ?’ सुधीर जी ने खुद से पूछा। ‘शायद बड़े रईसों का आश्रम है, तो सिक्योरिटी टाइट होगी।’
मगर असली रहस्य का पर्दा रात को उठना था।
भाग ३: आधी रात, तूफ़ान और तहखाना
शनिवार की रात नौ बजे आसमान पर काले, विकराल बादलों ने डेरा डाल दिया। हिमालय के पहाड़ों में ऐसा तूफ़ान बहुत कम देखने को मिलता था। चीड़ के बड़े-बड़े पेड़ हवा के थपेड़ों से चरमराने लगे। और ठीक साढ़े नौ बजे—तेज़ बिजली कड़की और पूरे आश्रम की लाइटें बुझ गईं।
बिजली का जाना कोई असामान्य बात नहीं थी, मगर अजीब बात यह थी कि आश्रम का मुख्य दरवाजा, जो भारी ओक की लकड़ी का बना था, एक भारी ‘क्लिक’ की आवाज़ के साथ अपने आप ऑटोमैटिक इलेक्ट्रॉनिक लॉक हो गया।
मौन व्रत के कारण कोई बोल नहीं सकता था, मगर कमरों में खिड़कियों के शीशे बज रहे थे।
सुधीर जी को प्यास लगी थी। उनके कमरे का पानी खत्म हो चुका था। वे टॉर्च न होने के कारण दीवार टटोलते हुए रसोई की तरफ बढ़े।
रसोई के पास से एक संकरा जीना नीचे तहखाने की ओर जाता था। उस जीने से एक बहुत हल्की, नीली रोशनी छनकर आ रही थी और साथ ही एक निरंतर घुरघुराहट—जैसे कोई हाई-स्पीड कूलिंग फैन चल रहा हो। आश्रम की बिजली गुल थी, तो तहखाने में यह पावर कहाँ से आ रही थी?
जिज्ञासा डर पर हावी हो गई। सुधीर जी ने चप्पलें उतारीं और नंगे पाँव सीढ़ियाँ उतरने लगे।
तहखाने का नज़ारा देखकर सुधीर जी के पाँव ज़मीन में जम गए।
वहाँ कोई ध्यान-कक्ष या आलू-प्याज का भंडार नहीं था। वह एक अत्याधुनिक, साउंडप्रूफ ‘डेटा-क्लोनिंग लैब’ थी!
कांच के केबिन के भीतर चार विशाल सर्वर रैक नीली और हरी एलईडी लाइटों से जगमगा रहे थे। और मेज़ पर वही पीतल की टोकरियाँ रखी थीं, जिनमें मेहमानों के गैजेट्स जमा कराए गए थे!
तीन तकनीकी ऑपरेटर हाई-स्पीड केबल्स के ज़रिए सभी मेहमानों के फोन और लैपटॉप्स को एक केंद्रीय टर्मिनल से जोड़कर डेटा एक्सट्रैक्ट कर रहे थे।
स्क्रीन पर फाइलें तेजी से डाउनलोड हो रही थीं:
रोहन मल्होत्रा: 'Fintech_Seed_Algorithm_v4.enc' (84% Cloned)
वर्मा जी: 'Min_Defense_Pension_Registry_Confidential.pdf' (100% Downloaded)
सुधीर जी: 'Q4_Merger_Acquisition_Strategy.docx' (72% Downloaded)
और उनके पीछे कुर्सी पर मखमली चोगा उतारकर टी-शर्ट और जींस में खड़े थे—आचार्य बोधानंद उर्फ गौरव मेहता!
उनके हाथ में एक सैटेलाइट फोन था। वे किसी से कह रहे थे: “हाँ बॉस, इस बैच में जैकपॉट लग गया है। रोहन का पूरा पेमेंट गेटवे सोर्स कोड हमारे हाथ में है, इसे डार्क वेब पर तीन मिलियन डॉलर में बेचेंगे। और वर्मा के पुराने रक्षा टेंडर्स की फाइलें भी मिल गई हैं। सुबह छह बजे जब लैंडस्लाइड का नाटक होगा, हम सभी डिवाइसेस को ‘वाइप’ करके फॉर्मेट कर देंगे और कह देंगे कि बिजली गिरने से सिस्टम क्रैश हो गया। ये अमीर मूर्ख शांति खोजते हुए अपने ही हाथों अपनी कंपनियों की चाबी हमें सौंप गए!”
सुधीर जी के माथे से पसीने की ठंडी बूँद टपकी। यह कोई रिट्रीट नहीं था, यह भारत का सबसे परिष्कृत ‘साइबर हनीट्रैप’ था! जहाँ देश के शीर्ष दिमागों को ‘डिजिटल डिटॉक्स’ और ‘मौन’ के नाम पर निहत्था करके उनका बौद्धिक और वित्तीय साम्राज्य लूटा जा रहा था!
सुधीर जी पीछे हटने लगे। मगर दुर्भाग्य! उनका पैर लोहे की एक बाल्टी से टकरा गया—खट-खटाक!
तहखाने में सन्नाटा खिंच गया।
“कौन है वहाँ?” बोधानंद की तीखी, क्रूर आवाज़ गूँजी। “सैम, बाहर देखो!”
भाग ४: फंदे में फंसे
सुधीर जी हवा की गति से सीढ़ियाँ चढ़े। अँधेरे गलियारे में भागते हुए उनका दिल पसलियों को तोड़कर बाहर आने को बेताब था। पीछे से भारी जूतों की आवाज़ आ रही थी।
वे सीधे पहले कॉटेज में घुसे और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।
यह कमरा रोहन मल्होत्रा का था। अँधेरे में रोहन हड़बड़ाकर उठा, “हू इज़ इट? मौन व्रत है भाई...”
सुधीर जी ने उसका मुँह दबा दिया। फुसफुसाते हुए, हाँफती आवाज़ में बोले, “मौन व्रत की ऐसी की तैसी, रोहन! तुम्हारी पूरी कंपनी लुट चुकी है। हमारा कत्ल भी हो सकता है। चुपचाप सुनो!”
सुधीर जी ने दो मिनट में पूरी बात समझाई। रोहन का चेहरा पीला पड़ गया, “माई गॉड! मेरा क्रिप्टो वॉलेट... मेरी कंपनी का नया एल्गोरिदम... अगर वो लीक हो गया तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा! पर हमारे पास फोन नहीं है, पुलिस को कैसे बुलाएँ?”
“और यह आश्रम बाहर से लॉक है। तूफ़ान के कारण सड़कें वैसे ही बंद हैं,” सुधीर जी ने कहा।
“हमें बाकी लोगों को जगाना होगा,” रोहन ने काँपते हुए कहा।
दोनों चुपके से बगल के कमरों में गए। पाँच मिनट के भीतर शिखा, वर्मा जी और दो अन्य मेहमान वर्मा जी के कमरे में इकट्ठा हो गए।
शिखा रोने लगी, “आई टोल्ड यू, मुझे इस जगह की वाइब्स शुरू से ऑफ लग रही थीं! मुझे घर जाना है!”
“शांत रहो, बिटिया!” वर्मा जी की आवाज़ में अचानक वही पुराना फौजी अनुशासन लौट आया। रिटायर्ड अधिकारी की रीढ़ सीधी हो गई। “अगर इन बदमाशों को पता चला कि हमें भनक लग चुकी है, तो ये हमें यहाँ से ज़िंदा बाहर नहीं जाने देंगे। पहाड़ में खाई बहुत गहरी होती है, हादसा दिखाना बहुत आसान है।”
“तो हम क्या करें?” सुधीर जी ने पूछा।
वर्मा जी ने खिड़की से बाहर देखा। तूफ़ान उफान पर था। बिजली की कौंध में उन्होंने देखा कि दो हथियारबंद गार्ड टॉर्च लेकर कॉटेजों की तलाशी ले रहे थे। वे एक-एक कमरा चेक कर रहे थे।
“हमारे पास हथियार नहीं हैं, पर दिमाग है,” वर्मा जी ने योजना बनाई। “रोहन, तुम टेक के आदमी हो। क्या तुम उन सर्वर्स को क्रैश कर सकते हो?”
रोहन ने सिर हिलाया, “अगर मुझे मेन कंसोल तक तीन मिनट मिल जाएँ, तो मैं लूप-कमांड डालकर उनका पूरा हार्ड ड्राइव बर्न कर सकता हूँ। पर वहाँ गार्ड्स हैं!”
सुधीर जी की आँखों में चमक आई। उन्होंने शिखा की ओर देखा, “शिखा, तुम्हारा वो दूसरा सीक्रेट फोन कहाँ है?”
शिखा चौंक गई, “आपको कैसे पता?”
“कल रात झाड़ियों में देखा था मैंने। क्या उसमें बैटरी है?”
“सिर्फ नौ परसेंट!” शिखा ने पर्स से फोन निकालते हुए कहा। “पर यहाँ नेटवर्क नहीं है सुधीर जी!”
सुधीर जी मुस्कुराए, “नेटवर्क नहीं चाहिए। उसका कैमरा और फ्लैशलाइट चाहिए।”
तभी बाहर कदमों की चाप सुनाई दी। एक गार्ड सीधे वर्मा जी के कॉटेज की तरफ बढ़ रहा था।
भाग ५: ऑपरेशन ‘ऑर्गेनिक स्ट्राइक’
योजना तुरंत क्रियान्वित हुई।
गार्ड ने जैसे ही कमरे का हैंडल घुमाया और दरवाज़ा खोला, शिखा ने अंधेरे में उसके ठीक चेहरे पर फोन का पावरफुल एलईडी फ्लैश और कैमरे का बर्स्ट-मोड ऑन कर दिया—लगातार पंद्रह हाई-इंटेंसिटी फ्लैश!
गार्ड की आँखें चौंधिया गईं, “आह! क्या बकवास...”
इससे पहले कि वह संभलता, वर्मा जी ने होटल की भारी लकड़ी की कुर्सी पूरी ताकत से उसकी पिंडलियों पर दे मारी। गार्ड लड़खड़ाकर गिरा, और सुधीर जी तथा रोहन ने मिलकर उस पर भारी रजाई डाल दी। एक मिनट के भीतर गार्ड को उसी की बेल्ट और चादर से बांधकर मुँह में तौलिया ठूँस दिया गया।
उसकी जेब से एक वॉकie-टॉकी और इलेक्ट्रॉनिक मास्टर-की मिल गई!
वॉकie-टॉकी पर आवाज़ आई: “सैम, गेस्ट्स अपने कमरों में हैं? सर्वर डेटा 95% हो गया है। पंद्रह मिनट में वैन निकालनी है।”
वर्मा जी ने वॉकie-टॉकी दबाया और भारी गले से खाँसते हुए सिर्फ दो बार स्टैटिक बटन दबाया, जैसा फौजी कोड में होता है। दूसरी तरफ से कोई शक नहीं हुआ।
“अब सुनो,” सुधीर जी ने कमान संभाली। “रोहन और मैं तहखाने जाएँगे। वर्मा जी, आप शिखा और बाकी लोगों को लेकर पिछले रास्ते से किचन के आउटलेट की तरफ बढ़िए। वहाँ से जंगल का रास्ता निकलता है।”
“और पुलिस?” शिखा ने पूछा।
सुधीर जी ने कहा, “पहाड़ के नीचे उस मोड़ पर गड़रिये का डेरा है। वह सुबह चार बजे उठ जाता है। उसके पास गांव के प्रधान का लैंडलाइन फोन है। किसी तरह खबर पहुँचानी होगी।”
भाग ६: तहखाने में द्वंद्व और साइबर पलटवार
सुधीर जी और रोहन दबे पाँव तहखाने में घुसे।
वहाँ सिर्फ एक ऑपरेटर बैठा था, बाकी लोग बाहर वैन में सामान लोड करने गए थे। स्क्रीन पर प्रोग्रेस बार दिखा रहा था: 98%।
रोहन ने बिल्ली जैसी फुर्ती दिखाई। उसने पीछे से जाकर उस ऑपरेटर की गर्दन पर ‘स्लीपर होल्ड’ बना दिया—जो उसने कभी कॉलेज में मार्शल आर्ट्स क्लास में सीखा था। ऑपरेटर बिना आवाज़ किए बेहोश होकर लुढ़क गया।
रोहन की उँगलियाँ की-बोर्ड पर बिजली की तरह नाचने लगीं।
“डेटा ट्रांसफर रोको!” सुधीर जी ने फुसफुसाया।
“सिर्फ रोकना नहीं है, ब्रो,” रोहन के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आई। “मैं इनका बैकअप सर्वर वाइप कर रहा हूँ, और जो डेटा इन्होंने चुराया था, उसे एन्क्रिप्ट करके एक हिडन क्लाउड पर ट्रांसफर कर रहा हूँ। साथ ही, इनका पूरा सिस्टम ओवरहीट होकर फ्राय हो जाएगा!”
अचानक पीछे से पिस्तौल लोड होने की ठक-ठक आवाज़ आई।
“बहुत खूब, मिस्टर मल्होत्रा। फिनटेक का दिमाग सचमुच तेज़ होता है।”
सुधीर जी और रोहन ने पलटकर देखा। दरवाजे पर आचार्य बोधानंद खड़े थे। उनके हाथ में 9mm की ग्लॉक पिस्तौल तनी हुई थी। उनके चेहरे पर अब कोई आध्यात्मिक चमक नहीं थी, सिर्फ एक पेशेवर अपराधी की ठंडी क्रूरता थी।
“हाथ की-बोर्ड से हटाओ, धीरे से!” बोधानंद ने दाँत पीसते हुए कहा। “मुझे लगा था तुम दोनों शहर के दब्बू चूहे हो, जो बिना नमक की तोरी खाकर रोते हैं। पर तुम तो बिल खोदने लगे!”
“गौरव मेहता,” सुधीर जी ने शांत आवाज़ में कहा, ताकि रोहन को समय मिल सके (रोहन चुपके से अपने पैर के अंगूठे से सीपीयू का मेन पावर स्विच दबाने की कोशिश कर रहा था)। “तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है। बाहर पुलिस पहुँचने वाली है।”
बोधानंद हँसा, एक कर्कश ठहाका। “पुलिस? इस तूफ़ान में? सड़क पर दो जगह लैंडस्लाइड हमने खुद कराई है। सुबह तक जब तक कोई पहुँचेगा, तुम सब इस घाटी की किसी गहरी खाई में गिरे हुए मिलोगे—एक ‘दुखद बस दुर्घटना’। और दुनिया कहेगी, बेचारे शांति ढूँढ़ने गए थे, मोक्ष मिल गया!”
उसने ट्रिगर पर उँगली का दबाव बढ़ाया।
ठीक उसी क्षण—तहखाने के वेंटिलेशन शाफ्ट से एक भारी, जलती हुई लकड़ी का लट्ठा नीचे आ गिरा! साथ ही मिर्च का तीखा धुआँ कमरे में भर गया!
“आँखें बंद करो!” ऊपर से एक जानी-पहचानी, गूँजती हुई देहाती आवाज़ आई।
वह कृपाल था—वही स्थानीय गड़रिया!
वर्मा जी और शिखा जंगल की तरफ भागते हुए कृपाल से टकरा गए थे। कृपाल ने जब सुना कि ‘आश्रम के पाखंडी बाबू लोगों को मार रहे हैं’, तो उसने अपनी पूरी टोली और जलती हुई लकड़ियों के साथ गुप्त वेंटिलेशन रास्ते से धावा बोल दिया था!
मिर्च के धुएँ से बोधानंद की आँखें जलने लगीं। उसने अंधाधुंध एक गोली चलाई, जो दीवार में धँस गई।
सुधीर जी ने एक सेकंड का भी संकोच नहीं किया। पिछले दस साल का सारा कॉर्पोरेट फ्रस्ट्रेशन, बॉस की डांट, क्लाइंट के नखरे और ईएमआई का गुस्सा एक साथ उनकी मुट्ठी में सिमट आया। उन्होंने अपनी पूरी ताकत से एक भारी अग्निशामक यंत्र (Fire Extinguisher) उठाया और बोधानंद के पेट में दे मारा!
बोधानंद कराहते हुए ज़मीन पर गिरा और उसकी पिस्तौल छिटक कर दूर जा गिरी।
रोहन ने तुरंत छलांग लगाकर पिस्तौल अपने कब्जे में ले ली।
तभी बाहर सायरन की गूँजती हुई आवाज़ें पहाड़ों से टकराने लगीं—टूं... टूं... टूं...!
कृपाल ने नीचे आकर अपनी लाठी ज़मीन पर पटकी और दाँत दिखाते हुए बोला, “बाबूजी, पुलिस चौकी वाले दरोगा जी हमारे समधी हैं! हमने जंगल के शॉर्टकट से उन्हें दस मिनट में बुला लिया!”
भाग ७: भोर की नई किरण (Happy Ending)
सुबह के छह बजे तक ‘शून्य’ का पूरा पाखंड पुलिस की गिरफ्त में था।
उत्तराखंड पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने बोधानंद और उसके छह साथियों को हथकड़ियों में जकड़कर जीप में बिठा दिया था। आश्रम के गुप्त कमरों से करोड़ों के विदेशी मुद्रा, डार्क वेब सर्वर्स, और न जाने कितने कॉर्पोरेट दिग्गजों के ब्लैकमेलिंग डॉक्युमेंट्स बरामद हुए थे।
डीएसपी साहब ने सुधीर जी, रोहन और वर्मा जी से हाथ मिलाते हुए कहा, “कमाल कर दिया आप लोगों ने! यह गिरोह पिछले दो साल से देश भर में ‘वेलनेस रिट्रीट’ के नाम पर हाई-प्रोफाइल डेटा चोरी का रैकेट चला रहा था। अगर आज आप लोग इन्हें न पकड़ते, तो देश के बड़े वित्तीय संस्थानों को अरबों का चूना लग जाता।”
शिखा अपने उसी छोटे फोन से लाइव नहीं कर रही थी, बल्कि हाथ जोड़कर कृपाल गड़रिये को धन्यवाद दे रही थी, जिसने समय पर अपनी जान जोखिम में डालकर धुआं छोड़ा था।
दोपहर को जब धूप पूरी तरह खिल गई, तो आश्रम के बाहर सड़क किनारे कृपाल के छोटे से कच्चे ढाबे पर एक अद्भुत दृश्य था।
वहाँ कोई ऑर्गेनिक सूप नहीं था।
लोहे के बड़े तवे पर मक्खन से लथपथ गरमा-गरम आलू-प्याज़ के पराठे सिक रहे थे। पीतल की बड़ी देगची में इलायची और अदरक वाली कड़क चाय खौल रही थी।
रोहन, जो दो दिन पहले तक कैलोरी गिनकर पानी पीता था, वह तीसरा पराठा मुँह में ठूँसते हुए बोला, “सुधीर भाई, इस पराठे में जो एनलाइटनमेंट (आत्मज्ञान) है ना, वो दुनिया के किसी रिट्रीट में नहीं है!”
वर्मा जी कड़क चाय की चुस्की लेते हुए ठहाका मार रहे थे, “कहा था ना मैंने, पुरानी फौजी ट्रेनिंग कभी व्यर्थ नहीं जाती!”
और सुधीर जी?
सुधीर जी ने अपना फोन पुलिस से वापस ले लिया था। स्क्रीन पूरी तरह सुरक्षित थी, कोई डेटा चोरी नहीं हुआ था।
उन्होंने फोन ऑन किया। स्क्रीन पर चिन्मय का वही पुराना मैसेज चमक रहा था: “ब्रो, शून्य कैसा रहा? इनर-पीस मिली क्या?”
सुधीर जी ने खिड़की से बाहर देखा। सामने दूर बर्फ की सफेद चोटियाँ मुस्कुरा रही थीं, पास ही देवदार के पत्तों पर ओस चमक रही थी, और सामने उनके नए दोस्त—जिन्होंने रात भर एक-दूसरे की जान बचाई थी—हँस रहे थे।
सुधीर जी ने चिन्मय को एक छोटा-सा रिप्लाई टाइप किया:
“शांति शून्य में नहीं मिली चिन्मय, शांति सच में मिली। और हाँ, कल से ऑफिस में नौटंकी बंद... ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है अगर तुम इसे कैमरे के लेंस के बजाय अपनी आँखों से देखो।”
उन्होंने फोन को जेब में रखा, एक कप गरम चाय उठाई और पहली बार बिना किसी हड़बड़ी के, उस हसीन सुबह की धूप को अपनी रूह में उतरते महसूस किया।
यह उनका असली, अनमोल और मुफ़्त का मोक्ष था।