मेरी चेतना की रागिनी, मेरी श्वास का संधान है,
यह मात्र एक भाषा नहीं, मेरे धर्म का अधिष्ठान है।
उर में प्रवाहित सरित-सम, रस-भाव की यह साधना,
हिंदी हमारी अस्मिता, हिंदी परम आराधना।
शब्दों में जिसके गूँजता, इतिहास का उद्घोष है,
नव-उत्कर्ष संस्कृति का, यह नित्य संचित कोष है।
तुलसी, निराला, प्रेमचंद, अमृतप्रभा यह भारती,
निज कर्म के प्रांगण में नित, उतारूँ इसकी आरती।
मेरी लेखनी का धर्म है, सत्यम्-शिवम् को साधना,
हिंदी बने सबका कर्मपथ, यह प्राणों की संकल्पना।
नित शब्द-अर्चना खिले, पुरुषार्थ के विस्तार में,
युग-बोध का दर्शन सजे, इसके सहज शृंगार में।
केवल दिवस-उत्सव नहीं, यह नित्य जीवन-चेतना,
हो कर्म में प्रतिपादित, निज राष्ट्र की संवेदना।
संवाद की शुचि वर्तनी, मेरी दृष्टि का आलोक है,
हिंदी न केवल शब्द है, यह सृष्टि का परितोष है।
रण-रागिनी सी गूँजती, यह सिंह-सी दहाड़ है,
आहत न होगी अस्मिता, यह वज्र-दृढ़ विश्वास है!
पाखंड-पर्वत चूर हो, जब शब्द-सायक छूटते,
मिथ्या-कपट के दुर्ग सब, पल-मात्र में हैं टूटते!
कल-कल, प्रखर, छल-छल बहे, भावों का भीषण ज्वार हो,
रस-छंद-युत इस गिरा पर, कोटिक भुवन बलिहार हो!
है कर्म मेरा शब्द-शर, और धर्म हिंदी-साधना,
मेरे देह की हर श्वास में, यह राष्ट्र-हित आराधना!
प्रतिध्वनित हो व्योम में, अब शंखनाद अनंत हो,
निज भाल का सिंदूर बन, यह भारती-जयवन्त हो!
जब तक शिरा में रक्त की, उद्दाम निर्मल धार है,
हिंदी हमारा धर्म है, मम कर्म का जयकार है!
जब तक हमारे जिस्म में, साँसों का ये उफान है,
हिंदी अमर-अटल रहे, इसी में अपनी जान है!
इसी में अपनी शान है!
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