जिन्दगी के सफर में ,
इस अनोखे डगर में,
देखो मै चल रहा,
मै रोज जल रहा।
तूफ़ान से लड़ा,
आकाश में खड़ा,
जिद में अड़ा,
बेजान हूँ पड़ा,
हवा की वेग से बढ़ा ,
हिमालय की चोटी पे चढा,
एक राह देखकर मै चला,
पाया उसे मैंने जिसके लिए चला।
अंत देखकर, खुसी से जा मिला,
मिली थी रौशनी, अब अन्धकार में चला,
ये था जानता, इसी में था भला,
इसी में था भला।
Thursday, June 18, 2009
Wednesday, June 17, 2009
हिन्दी कविता : कर्म करो
आत्मा है कर्म की प्यासी ,
नियति भी है कर्म की दासी ।
नियति कोरे पृष्ट सी होती ,
जिसपर डाल कर्म के मोती ।
नियति का भरोसा न करना ,
कर्म को करके ही मरना ।
विपति अपने आप सहो तुम ,
जलकर आब स्वर्ण बनो तुम ।
जगत में आब कुछ नाम करो अपना ,
पुरा करो दिखे जो सपना ।
दुनिया की बोली तुम छोडो,
अपने को कर्म से जोडो ।
कर्म का बजाओ ऐसा डंका ,
मिट जाए लोगो की शंका ।
कर्म का ऐसा तीर चलाओ ,
बाधाओं को मार गिराओ।
नियति चरणों में गिर जाती ,
जब कर्म की सेना आती ।
कर्म से धर्म , धर्म से भक्ति ,
कर्म ही शिव , भ्रमह और शक्ति ।
नियति भी है कर्म की दासी ।
नियति कोरे पृष्ट सी होती ,
जिसपर डाल कर्म के मोती ।
नियति का भरोसा न करना ,
कर्म को करके ही मरना ।
विपति अपने आप सहो तुम ,
जलकर आब स्वर्ण बनो तुम ।
जगत में आब कुछ नाम करो अपना ,
पुरा करो दिखे जो सपना ।
दुनिया की बोली तुम छोडो,
अपने को कर्म से जोडो ।
कर्म का बजाओ ऐसा डंका ,
मिट जाए लोगो की शंका ।
कर्म का ऐसा तीर चलाओ ,
बाधाओं को मार गिराओ।
नियति चरणों में गिर जाती ,
जब कर्म की सेना आती ।
कर्म से धर्म , धर्म से भक्ति ,
कर्म ही शिव , भ्रमह और शक्ति ।
Monday, June 15, 2009
हिन्दी कविता : मै भी था कायर
मै भी था कायर ,
हर दिन मरता था डर डर कर,
मै भी था कायर ।
आहिंसा का सहारा लेकर ,
मै भी बन जाता था गाँधी ,
डर कायरता की चलती थी आंधी ।
संसार में कुछ नही कर पाता था ,
यही सोच मै पछताता था ।
पर मैंने एक दिन यह थाना,
कायरता से आब कोई न नाता निभाना ।
छोड़ दूंगा अहिंसा करना ,
बार बार है आब नही मरना ।
फिर वीरता की पवन चली ,
मचा गई जीवन में खलबली ।
यह देख पर्वत भी डोला ,
सत्रु भी प्रशंशा के बोल बोला ।
वीरता की तपन है ऐसी ,
आग लगे पानी में जैसी ।
विश्व में आब मै कोलाहल कारता ,
डर के नाम से आब मै डरता ।
वीर पुरूष ही संसार चलता ,
जो चाहता वह वो पता ,
संसार को जैसे चाहे नचाता ,
अपनी बात का लोहा मानवता ।
हर दिन मरता था डर डर कर,
मै भी था कायर ।
आहिंसा का सहारा लेकर ,
मै भी बन जाता था गाँधी ,
डर कायरता की चलती थी आंधी ।
संसार में कुछ नही कर पाता था ,
यही सोच मै पछताता था ।
पर मैंने एक दिन यह थाना,
कायरता से आब कोई न नाता निभाना ।
छोड़ दूंगा अहिंसा करना ,
बार बार है आब नही मरना ।
फिर वीरता की पवन चली ,
मचा गई जीवन में खलबली ।
यह देख पर्वत भी डोला ,
सत्रु भी प्रशंशा के बोल बोला ।
वीरता की तपन है ऐसी ,
आग लगे पानी में जैसी ।
विश्व में आब मै कोलाहल कारता ,
डर के नाम से आब मै डरता ।
वीर पुरूष ही संसार चलता ,
जो चाहता वह वो पता ,
संसार को जैसे चाहे नचाता ,
अपनी बात का लोहा मानवता ।
हिन्दी कविता : वीर राम
राम ने धनुष उठाकर वार किया,
आपनी गर्जना से आकाश को भर दिया ।
खंड खंड हो गए दानव,
जब क्रोध में आया यह महा मानव ।
काल , बेताल सब नाचते है ,
करते राम का आदर सत्कार,
जनम लिए अवद में विष्णु के मानव अवतार।
खुशिया आ गई अवद में,
हुआ हर्षा विस्तार ।
कोटि सूर्य ठंडे पड़ गए ,
कोटि चंद्र भी शर्म से मर गए ।
बहाव रुका पवन का ,
जब देखा रूप रघुनंदन का ।
दुष्टों का हुआ उथार ,
पंहुचा दिया सवर्ग के द्वार ,
राम ने किया सब का बेडा पर ,
लगाया सबको भवसागर के पार ।
आपनी गर्जना से आकाश को भर दिया ।
खंड खंड हो गए दानव,
जब क्रोध में आया यह महा मानव ।
काल , बेताल सब नाचते है ,
करते राम का आदर सत्कार,
जनम लिए अवद में विष्णु के मानव अवतार।
खुशिया आ गई अवद में,
हुआ हर्षा विस्तार ।
कोटि सूर्य ठंडे पड़ गए ,
कोटि चंद्र भी शर्म से मर गए ।
बहाव रुका पवन का ,
जब देखा रूप रघुनंदन का ।
दुष्टों का हुआ उथार ,
पंहुचा दिया सवर्ग के द्वार ,
राम ने किया सब का बेडा पर ,
लगाया सबको भवसागर के पार ।
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