अविचल बीज और दर्पण
बीज स्वयं को भस्म करे तब वृक्ष गगन को छूता है,
मिट्टी में जो लीन हुआ, क्या वही अमर सच होता है?
छाया को तलवार काटती, पर काया निष्प्राण नहीं,
जो दिखता है वही भरम है, जो अदृश्य उसका अंत नहीं।
पाषाणों के मौन गर्भ से बहती है जो पावन धार,
वही तपस्या, वही समर्पण, वही पुरुषार्थ की पतवार।
दर्पण के सम्मुख जो ठहरा, उसने अपना भेद दिया,
जिसने भीतर झाँक लिया, उसने त्रिभुवन को जीत लिया।
अग्नि स्वयं को कब दहकाती, वह तो बस जलना जाने,
सत्य वही जो मिटने पर भी अपनी पहचान न माने।
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