शून्य से हुंकार तक
मौन निशा का गहन कुहासा, सुप्त पड़ी है वसुधा सारी,
ज्यों समाधि में लीन तपस्वी, ओढ़े नीरवता की भारी।
राख तले इक सुलग रही है, मंद शिखा अंगार लिए,
सोती है पौरुष की ज्वाला, अंतर में प्रतिशोध लिए॥
किंतु कब तलक पाषाण-हृदय यह, अग्नि-स्फुलिंग दबाएगा?
कब तक तम का अंध-जाल यह, जीवन-ज्योति छिपाएगा?
कण-कण में अब कम्पन जागा, ज्यों सुप्त सिंह अँगड़ाई ले,
सन्नाटे को चीर अचानक, मानो कोई तुरही बजाए दे॥
झन-झन टूटीं शिथिल शृंखला, पग-पग पर प्रस्थान हुआ,
शून्य क्षितिज पर तड़ित-नाद सा, सोए रक्त का उद्गान हुआ।
धमनियों में जो हिम-सा जमा था, वह शोणित अब खौल उठा,
अंधड़ के संग मिलकर अंतर का डमरू, धुन घोल उठा॥
मत्त गजों से मेघ गगन में, गरज रहे घनघोर कराल,
चरण-प्रहारों से थर्राती, डोल रही भूमंडल-थाल!
ज्वालामुखी के कपाट खुले, फूटी प्रचंड हुंकार नई,
मृत्यु-भीति को भस्म बनाती, चमकी खड्ग-धार नई॥
उठ! कि आज विधाता भी तेरे, मस्तक का नव तेज गिने,
तू वह प्रलय-पवन है जिसका, कोई काल न छोर गिने!
फूँक दे संशय के शैल-शिखर, बन जा तू विकराल प्रपात,
चीर तिमिर के वक्षस्थल को, रच दे तू नूतन प्रभात!॥
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