Thursday, September 17, 2026

सरिता का संकल्प

 

सरिता का संकल्प


हिम-गिरि के पाषाण-हृदय से, फूटी कोमल जल की धार,

ज्यों कठोर तप के उपरांत ही, मिलता है अमृत-उपहार।

शैशव में चंचल-चांदनी-सी, खेल रही शिखरों के संग,

कल-कल छल-छल नूपुर बाजे, थिरक उठी नव-प्राण उमंग॥


कठिन शिलाएँ मार्ग रोकतीं, भीषण खड्ड डराते हैं,

किंतु अडिग पद कब बाधा के, सम्मुख शीश झुकाते हैं?

वज्र-कठिन चट्टानों को भी, काट दिया मृदु चुंबन से,

हार गई पाषाणी जड़ता, कोमल जल के क्रंदन से॥


तपती मरुभूमि के उर पर, हरित-दुकूल पहनाया है,

जिसने भी कंटक बिखराए, उसको अमृत लौटाया है।

तृषित कंठ, तरुवर और पंछी, सबको जीवन-दान दिया,

बिना रुके निज कर्म-पंथ पर, बहने का वरदान लिया॥


गंभीर-घोष से सिंधु बुलाता, अपनी बाहें फैलाए,

दूर क्षितिज का नील वितान भी, सम्मुख शीश नवाए।

खोकर निज सीमित अस्तित्व को, पा जाती असीम विस्तार,

यही मुक्ति है, यही शांति है—बूँद हुई सागर-साकार॥

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