मुक्ति-प्रस्थान
कनक-भवन में सोई दुनिया, सोए सब विलास-उपहार,
मूक दीप की मद्धिम लौ पर, काँप रहा नश्वर संसार।
कुसुम-सेज पर शांत पड़ी थीं, यशोधरा गोपा सुकुमार,
अंक-लीन था सुत राहुल भी, ज्यों कलिका पर ओस-निखार॥
किंतु जागती थीं दो आँखें, तृषित शांति की खोज लिए,
क्षणभंगुर इस काया पर सब, मरण-जरा का बोझ लिए।
राजमुकुट का स्वर्ण-कंगूरा, तृण-सम आज प्रतीत हुआ,
अंतर का वैराग्य-समंदर, मोह-तटों से रीत हुआ॥
मौन चरण धर, कंथक पर चढ़, राजपुत्र वन-पंथ चला,
छोड़ छत्र-सिंहासन सारा, अमर सत्य की ओर ढला।
राजकुंवर जब बुद्ध बना तब, जग को मिला अहिंसा-दान,
त्याग-सिंधु की एक बूँद ने, बदल दिया मानव-कल्याण॥
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