Friday, September 18, 2026

मुक्ति-प्रस्थान

 

मुक्ति-प्रस्थान

कनक-भवन में सोई दुनिया, सोए सब विलास-उपहार,

मूक दीप की मद्धिम लौ पर, काँप रहा नश्वर संसार।

कुसुम-सेज पर शांत पड़ी थीं, यशोधरा गोपा सुकुमार,

अंक-लीन था सुत राहुल भी, ज्यों कलिका पर ओस-निखार॥

किंतु जागती थीं दो आँखें, तृषित शांति की खोज लिए,

क्षणभंगुर इस काया पर सब, मरण-जरा का बोझ लिए।

राजमुकुट का स्वर्ण-कंगूरा, तृण-सम आज प्रतीत हुआ,

अंतर का वैराग्य-समंदर, मोह-तटों से रीत हुआ॥

मौन चरण धर, कंथक पर चढ़, राजपुत्र वन-पंथ चला,

छोड़ छत्र-सिंहासन सारा, अमर सत्य की ओर ढला।

राजकुंवर जब बुद्ध बना तब, जग को मिला अहिंसा-दान,

त्याग-सिंधु की एक बूँद ने, बदल दिया मानव-कल्याण॥

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