कलश स्वयं जब रिक्त हुआ तब सिंधु उसी में समाया,
जिसने छोड़ा रूप का मोह, उसने ही अलख को पाया।
काष्ठ जलकर भस्म बने तो पावक का विस्तार मिले,
बंधन टूटे जब नौका का, तब जाके उस पार मिले।
अडिग खड़ा जो गिरि-शिखर सा, वह भी माटी का संचय,
झुकती तृण की मौन लता में छिपा हुआ है अक्षय जय।
श्वास-तार पर जो न बजा, वही अनाहत गूंज रहा,
नेत्र मूंदकर अंतस्थल में अंधा किसको ढूंढ रहा?
नीर बहे जिस ओर सदा, वह अपनी प्यास न जाने,
धर्म वही जो कर्म बने पर कभी न कर्ता माने।
सीप चुराए स्वाति-बूँद को, मोती का आकार गढ़े,
चोट सहे जो पाषाण-हृदय, वही शिखर पर देव चढ़े।
तार खिंचे जब वीणा के तब राग नया जन्म लेता है,
मौन हुआ जब शब्द सभी तब ब्रह्म स्वयं स्वर देता है।
धूप जले निज अंग तपाकर, सुरभित सारा धाम करे,
पुण्य वही जो गुप्त रहे, न मुख से अपना नाम करे।
अंधकार की कोख से ही तो उदित प्रभाकर होता है,
स्वार्थ त्यागकर जो जागे, जग उसके पग में सोता है।
शून्य वही जो सब थामे, पर रेखा कोई खींच न पाए,
सत्य वही जो मिटकर भी हर साँस-साँस में जी जाए।
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