कच्ची झुग्गी के कीचड़ में खादी का धवल कमाल खिला,
कैमरे की बत्ती जली तभी, नेता का चेहरा लाल खिला।
दस गाड़ियों का लश्कर था, सौ बाहुबली सँग तने खड़े,
भूखे बच्चे के गाल छुए, जैसे कोई ऋषि महान बड़े।
सूखी रोटी के टुकड़े को अँगुलियों से सहलाते हैं,
गले रुंधे से भाषण में, आँसू का नीर बहाते हैं।
"यह दर्द तुम्हारा मेरा है, मैं कल्पवृक्ष बन आया हूँ!"
हँसती भीतर की जेबें थीं, "मैं नया तमाशा लाया हूँ।"
बूढ़ा फटी धोती वाला, सब मर्म भली-भाँति जानता था,
कि भेड़िए की इस करुणा में, वह अपना अंत पहचानता था।
पर लठैतों की लाठी देखकर, लब थर-थर काँप के मौन रहे,
जहाँ सच कहने पर मुँह टूटे, उस बस्ती में बोले कौन भले?
भीड़ तमाशा देख रही थी, ताली भी बेमन बजती थी,
दरबार वही, नाटक वही था, हर पाँचवें बरस जो सजती थी।
सब जान रहे थे पाखंडी है, मदिरा को गंगाजल कहता,
पर मन ही मन यह सोच रहे, यह चोर न हो तो कौन रहता?
मंडी में सब बिकने वाले, तराजू का कोई मोल नहीं,
हर थाली में विष ही विष है, कोई अमृत का घोल नहीं।
एक डाकू को तजकर दूजे लुटेरे पर टिकना था,
अंगूठे की मजबूरी थी, किसी न किसी पे गिरना था।
नेताजी छाती पीट रहे, "मैं जन-सेवक, मैं दास तुम्हारा!"
जनता मन ही मन मुस्काई, "तूने फिर काटा पत्ता हमारा।"
लोकतन्त्र के सर्कस में अब, जोकर ही शहंशाह बना,
और मूक तमाशबीनों का सिर, गिरवी रखने का गाहक बना।
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