नयन-नीर में तैर रहा कोई अनबुझ सा अफ़साना,
वो प्रियतम का पावन दर्शन या भ्रम का ताना-बाना?
अधरों पर अमृत छलकाती, पर नयनों में हलाहल है,
यह प्रेम-सुधा की सरिता है या तृष्णा की मृगतृष्णा चंचल है?
घन-घुंघराले केश-जाल में क़ैद हुई कस्तूरी-रात,
चाँद छुपा मुख-मंडल पीछे, मौन कहे हर गूढ़ बात।
कंचन-काया, चपल-छलावा, पास दिखे पर पा न सकूँ,
वियोग-दाह में जलता दीपक, चाहूँ भी तो बुझ न सकूँ।
सुरभित साँसों की सरगम में कोई भेद पुराना बजता है,
जो उर में रहकर प्राण हरे, वो वैरी है या सजता है?
यह वस्ल-राग की मादकता या विरह-जाल फैलाया है,
वो मुक्ति बनकर आया था या नूतन बंधन लाया है?
छाया-सी सँग-सँग डोल रही, पर काया का कोई भान नहीं,
अधरों पर थर-थर काँप रहा, पर स्वर में कोई गान नहीं।
सत्य वही या शून्य यही, इस खेल का अंत कहाँ होगा?
जो बंधा हुआ है साँसों से, क्या वही मुझे अब खोएगा?
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