राधेय का महा-उत्सर्ग
अर्क-उदित जाह्नवी-कूल पर, खड़ा तपोनिधि तेज-पुंज,
स्वर्ण-कवच से फूट रही थी, सूर्य-रश्मियों की प्रखर गुंज।
अंजलि में जल लिए समर्पित, अर्क-उपासक था गंभीर,
भुवन-भास्कर का प्रतिरूपक, शोभित था वह धनुर्धर वीर॥
तभी कपट का सघन कुहासा, याचक बनकर द्वार खुला,
विप्र-वेष में स्वयं पुरंदर, करने महा-अधर्म चला!
"देहि-भिक्षाम्!" काँप रहा था, शची-कांत का कायर स्वर,
भीख माँगने आया सुरपति, देवलोक का अधि-ईश्वर!॥
तात-सूर्य की अमर चेतावनी, कौंध गई अंतर्मन में—
"आएगा वासव छलने को, पार्थ-प्राण के रक्षण में!"
मुस्काया राधेय शांत-मुख, तनिक न मन में उपजी त्रास,
"छल से चाहे काल पधारे, टूटेगा न दान-विश्वास!"॥
"लो पुरंदर! संभालो भिक्षा, यह नश्वर आवरण तुम्हारा,
माँग रहा त्रैलोक्य-धनी आज, बन निर्धन-कंगाल बिचारा!"
खैंच कटार प्रखर ज्वाला-सी, वक्षस्थल पर फेर दिया,
मांस-अस्थि से चिपके चर्म को, हँसते-हँसते छील दिया!॥
उछल पड़ी शोणित की धारा, लाल हुआ जाह्नवी-नीर,
काट दिए कुंडल कानों से, डिगा न अपनी धुन से वीर!
रक्त-सिक्त वह कवच सौंपकर, हाथ जोड़ नतमस्तक था,
इंद्र लजीला, सहमा-काँपा, कर्ण बना महा-शाश्वत था!॥
थर्राया त्रैलोक्य अचानक, स्तंभित रह गए सब सुर-वृंद,
अश्रु-पात करते अंबर से, गिरते थे मुरझाए मकरंद!
दान-वीर के त्याग-सिंधु में, डूब गई इंद्र की शान,
जीत गया राधेय पराजित, हार गया सुरपति का मान!॥
छिन गया नश्वर कवच देह का, पर अमर हो गई यश-काया,
काल-व्याल भी डस न सकेगा, जिसकी पावन उज्ज्वल छाया!
जब-जब चमकेगा नभ में रवि, तब-तब गूँजेगा यह गान—
कर्ण सदृश न हुआ धरा पर, कोई दानी वीर महान!॥
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