Friday, September 18, 2026

राधेय का महा-उत्सर्ग

 

राधेय का महा-उत्सर्ग


अर्क-उदित जाह्नवी-कूल पर, खड़ा तपोनिधि तेज-पुंज,

स्वर्ण-कवच से फूट रही थी, सूर्य-रश्मियों की प्रखर गुंज।

अंजलि में जल लिए समर्पित, अर्क-उपासक था गंभीर,

भुवन-भास्कर का प्रतिरूपक, शोभित था वह धनुर्धर वीर॥


तभी कपट का सघन कुहासा, याचक बनकर द्वार खुला,

विप्र-वेष में स्वयं पुरंदर, करने महा-अधर्म चला!

"देहि-भिक्षाम्!" काँप रहा था, शची-कांत का कायर स्वर,

भीख माँगने आया सुरपति, देवलोक का अधि-ईश्वर!॥


तात-सूर्य की अमर चेतावनी, कौंध गई अंतर्मन में—

"आएगा वासव छलने को, पार्थ-प्राण के रक्षण में!"

मुस्काया राधेय शांत-मुख, तनिक न मन में उपजी त्रास,

"छल से चाहे काल पधारे, टूटेगा न दान-विश्वास!"॥


"लो पुरंदर! संभालो भिक्षा, यह नश्वर आवरण तुम्हारा,

माँग रहा त्रैलोक्य-धनी आज, बन निर्धन-कंगाल बिचारा!"

खैंच कटार प्रखर ज्वाला-सी, वक्षस्थल पर फेर दिया,

मांस-अस्थि से चिपके चर्म को, हँसते-हँसते छील दिया!॥


उछल पड़ी शोणित की धारा, लाल हुआ जाह्नवी-नीर,

काट दिए कुंडल कानों से, डिगा न अपनी धुन से वीर!

रक्त-सिक्त वह कवच सौंपकर, हाथ जोड़ नतमस्तक था,

इंद्र लजीला, सहमा-काँपा, कर्ण बना महा-शाश्वत था!॥


थर्राया त्रैलोक्य अचानक, स्तंभित रह गए सब सुर-वृंद,

अश्रु-पात करते अंबर से, गिरते थे मुरझाए मकरंद!

दान-वीर के त्याग-सिंधु में, डूब गई इंद्र की शान,

जीत गया राधेय पराजित, हार गया सुरपति का मान!॥


छिन गया नश्वर कवच देह का, पर अमर हो गई यश-काया,

काल-व्याल भी डस न सकेगा, जिसकी पावन उज्ज्वल छाया!

जब-जब चमकेगा नभ में रवि, तब-तब गूँजेगा यह गान—

कर्ण सदृश न हुआ धरा पर, कोई दानी वीर महान!॥

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