किंतु कोमल राग बदला, गरज उठी रण-दामिनी,
कांप उठी तम की छाती, खड्ग चमकी कामिनी।
अंगद-पग सा अडिग योद्धा, काल को ललकार दे,
वक्ष पर शर-जाल झेल जो मृत्यु को भी मार दे।
सिंधु के फेनिल थपेड़ों सम उठा दल-साज का,
कांपता भू-पृष्ठ सुनकर नाद रण के बाज का।
तप्त लोहे की झनक में गूंजती है हुंकृति,
अग्नि-वर्षा से सजी है काल की नव-आकृति।
धनुष की प्रत्यंचा खिंची जब, शून्य में संहार था,
अरि-घटा पर टूटता हर बाण वज्र-प्रहार था।
रुंड नाचे मुंड कटकर, रक्त की सरिता बही,
शौर्य की उस आहुति में अमरता जगती रही।
लोह-कवचों को चीरकर जो प्राण-दीपक धर दिया,
कायरों के मन-गगन को भय-रहित सा कर दिया।
घोर झंझावात में भी दीप सा अविचल जला,
वीर के पद-चाप पर ही भाग्य का पहिया चला।
अस्त होता भानु जब उस रक्त-रंजित भाल पर,
अमर गौरव मुस्कुराया मौत के विकराल पर।
धूल चूमकर शूर ने जब अंतिम साँसें तान दीं,
मातृभू की गोद ने फिर मुक्ति की पहचान दी।
मातृभू की गोद ने फिर मुक्ति की पहचान दी।
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