प्रकृति का नवरूप-शृंगार
अरुण-कपोलों पर मुसकाती, अंबर से उतरी उषा-नटी,
स्वर्ण-थाल में किरण सँजोए, तम की चादर समेटती।
नील गगन की रेशमी चुनरी, जिस पर जड़े सितारे लाख,
मंद-पवन के चंचल परस से, थिरक उठी सुरभित हर शाख॥
तुंग-शिखा के हिम-अंचल से, गिरते मूक प्रपात का गान,
कल-कल छल-छल नूपुर बाजे, छेड़ रहा कोई मीठी तान।
मानो गिरि के पाषाणी उर से, पिघल रहा हो तरल अनुराग,
श्वेत फेन की लहर-लहर में, हँसता निर्मल मानस-फाग॥
हरित-दुकूल ओढ़ तरु-राजी, किसलय-कर से ताल बजाए,
पल्लव-दलों पर ओस-कणों की, मुक्ता-माला जगमगाए।
हैं ये मोती या रजनी के, नयनों का सुचिता-वरदान?
देख चकित रह जाता उपवन, भूला अलि निज गुंजन-गान॥
काँच-सरीखा निर्मल जल ले, मस्तानी सरिता बलखाए,
तरंग-माला के नूपुर बाँधे, सागर से मिलने को धाए।
सरसिज के अधरों पर चुपके, भ्रमर सुनाता प्रणय-पुकार,
धूप-छाँह के ताने-बाने, प्रकृति सजाती नव-अभिसार॥
पश्चिम के रक्ताभ क्षितिज पर, आई संकोची संध्या-वधू,
स्वर्ण-धूलि नभ-अंग बिखेरी, पवन पिलाती मादक मधु।
नीड़ों को लौटते विहग-दल, पंखों से लिखते अनुराग,
शांत-स्निग्ध वन-वीथियों में, गूँज रहा विश्रांति-राग॥
चाँदी-सी हँसती राका-शशि, अंबर में अमृत छलकाए,
नीलम-थाली में मोती-से, दीप जलाए तारे मुस्काए।
मूक समाधि में लीन चराचर, पीता यह सौंदर्य-अगाध,
प्रकृति-हृदय में झलकता साक्षात, जगदीश्वर का रूप अगाध!॥
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