Monday, June 15, 2009

हिन्दी कविता : मै भी था कायर

मै भी था कायर ,
हर दिन मरता था डर डर कर,
मै भी था कायर ।

आहिंसा का सहारा लेकर ,
मै भी बन जाता था गाँधी ,
डर कायरता की चलती थी आंधी ।
संसार में कुछ नही कर पाता था ,
यही सोच मै पछताता था ।

पर मैंने एक दिन यह थाना,
कायरता से आब कोई न नाता निभाना ।
छोड़ दूंगा अहिंसा करना ,
बार बार है आब नही मरना ।

फिर वीरता की पवन चली ,
मचा गई जीवन में खलबली ।
यह देख पर्वत भी डोला ,
सत्रु भी प्रशंशा के बोल बोला ।

वीरता की तपन है ऐसी ,
आग लगे पानी में जैसी ।
विश्व में आब मै कोलाहल कारता ,
डर के नाम से आब मै डरता ।

वीर पुरूष ही संसार चलता ,
जो चाहता वह वो पता ,
संसार को जैसे चाहे नचाता ,
अपनी बात का लोहा मानवता ।

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