आत्मा है कर्म की प्यासी ,
नियति भी है कर्म की दासी ।
नियति कोरे पृष्ट सी होती ,
जिसपर डाल कर्म के मोती ।
नियति का भरोसा न करना ,
कर्म को करके ही मरना ।
विपति अपने आप सहो तुम ,
जलकर आब स्वर्ण बनो तुम ।
जगत में आब कुछ नाम करो अपना ,
पुरा करो दिखे जो सपना ।
दुनिया की बोली तुम छोडो,
अपने को कर्म से जोडो ।
कर्म का बजाओ ऐसा डंका ,
मिट जाए लोगो की शंका ।
कर्म का ऐसा तीर चलाओ ,
बाधाओं को मार गिराओ।
नियति चरणों में गिर जाती ,
जब कर्म की सेना आती ।
कर्म से धर्म , धर्म से भक्ति ,
कर्म ही शिव , भ्रमह और शक्ति ।
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