Thursday, June 18, 2009

कविता : जिन्दगी के सफर में

जिन्दगी के सफर में ,
इस अनोखे डगर में,
देखो मै चल रहा,
मै रोज जल रहा।

तूफ़ान से लड़ा,
आकाश में खड़ा,
जिद में अड़ा,
बेजान हूँ पड़ा,

हवा की वेग से बढ़ा ,
हिमालय की चोटी पे चढा,
एक राह देखकर मै चला,
पाया उसे मैंने जिसके लिए चला।

अंत देखकर, खुसी से जा मिला,
मिली थी रौशनी, अब अन्धकार में चला,
ये था जानता, इसी में था भला,
इसी में था भला।

No comments:

Post a Comment